बाँस बनेगा बिहार की हरित अर्थव्यवस्था का इंजन-रोजगार, महिला उद्यम और ग्रामीण समृद्धि का नया रोडमैप

पटना

बिहार में पहली बार ‘बिहार बाँस अर्थव्यवस्था शिखर सम्मेलन 2026’ का आयोजन
बाँस से ग्रामीण रोजगार, महिला उद्यम और हरित समृद्धि को मिलेगा नया आधार– राम कृपाल यादव

बीपी डेस्क। कृषि मंत्री, बिहार सरकार श्री राम कृपाल यादव द्वारा आज पटना स्थित कृषि भवन के सभागार में एक दिवसीय ‘बिहार बाँस अर्थव्यवस्था शिखर सम्मेलन 2026’ का उद्घाटन किया गया। इस सम्मेलन का उद्देश्य राज्य के बाँस क्षेत्र को गाँव-आधारित आजीविका, स्वरोजगार, मूल्य संवर्धन तथा बाजार से जोड़कर हरित एवं समावेशी आर्थिक विकास को गति देना है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधान सचिव, कृषि विभाग श्री नर्मदेश्वर लाल ने की। इस अवसर पर कृषि विभाग के वरिष्ठ पदाधिकारी, आईसीएआर, राष्ट्रीय बाँस मिशन, केरल वन अनुसंधान संस्थान, विभिन्न अनुसंधान एवं तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञ, एफपीओ, सहकारी समितियाँ, स्टार्ट-अप, कारीगर समूह, स्वयं सहायता समूह, जिला एवं प्रखंड स्तरीय अधिकारी, मीडिया प्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में किसान-उद्यमी उपस्थित रहे। सम्मेलन में बाँस आधारित उद्योग, प्रसंस्करण, विपणन तथा मूल्य-श्रृंखला विकास पर व्यापक विमर्श हुआ।

मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि “बाँस केवल एक पौधा नहीं, बल्कि गरीब और छोटे किसानों के लिए ‘हरा बचत खाता’ है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अब बिहार का लक्ष्य बाँस को घरेलू उपयोग से आगे बढ़ाकर वैज्ञानिक, संगठित और बाजार-उन्मुख उद्योग के रूप में विकसित करना है, ताकि यह स्थायी आय और सम्मानजनक जीवन का आधार बन सके।

उन्होंने कहा कि बिहार अब केवल कच्चा बाँस उपलब्ध कराने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि नर्सरी, रोपण, वैज्ञानिक प्रबंधन, कटाई-उपचार, प्राथमिक प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, फर्नीचर, अगरबत्ती स्टिक, पैकेजिंग तथा विपणन तक पूरी मूल्य-श्रृंखला विकसित की जाएगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार सृजन होगा, बिचौलियों पर निर्भरता घटेगी और आय का बड़ा हिस्सा सीधे उत्पादक परिवारों तक पहुँचेगा।

सरकार द्वारा बाँस क्षेत्र को मिशन मोड में आगे बढ़ाने हेतु तीन वर्षीय व्यावहारिक रोडमैप प्रस्तुत किया गया, जिसके अंतर्गत क्लस्टर आधारित रोपण विस्तार, उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री, कॉमन फैसिलिटी सेंटर, कौशल प्रशिक्षण, उपकरण सहायता तथा एफपीओ, सहकारी समितियों एवं स्वयं सहायता समूह आधारित महिला उद्यमों को बढ़ावा देने जैसे उपाय शामिल हैं।

सम्मेलन में अन्य राज्यों से आए सफल किसानों, उद्यमियों एवं संस्थाओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उपचारित एवं अर्ध-प्रसंस्कृत बाँस तथा उससे निर्मित उत्पाद कच्चे बाँस की तुलना में कई गुना अधिक आय प्रदान करते हैं। विशेष रूप से महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए यह क्षेत्र अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि अधिकांश गतिविधियाँ कौशल आधारित हैं और स्थानीय स्तर पर संचालित की जा सकती हैं।

कार्यक्रम के अंत में सभी हितधारकों से सरकार और समाज की साझेदारी के साथ कार्य करने का आह्वान किया गया, ताकि बाँस बिहार में हरित विकास, रोजगार सृजन और समावेशी समृद्धि का सशक्त आधार बन सके।

कृषि मंत्री ने राज्य सरकार के संकल्प को दोहराते हुए कहा —
“बिहार में बाँस का हर गुच्छा अब केवल बाड़ या बल्ली नहीं, बल्कि आय, रोजगार और आत्मसम्मान का स्रोत बनेगा। अगले तीन वर्षों में उपचार, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन की पूरी व्यवस्था विकसित कर गरीब, छोटे-सीमांत किसानों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं तक इसका लाभ पहुँचाया जाएगा।”