देश के विभिन्न हिस्सों से जुटेंगे 25 कुलपति, चार विशेष सत्र में होगी चर्चाएं
मोतिहारी, राजन द्विवेदी। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (एमजीसीयू) शिक्षा के क्षेत्र में एक नए अध्याय का आगाज करने जा रहा है। ताकि भारत की नई शिक्षा नीति में अंतराष्ट्रीय स्तर शिक्षा संस्थानों के अनुरूप अपने देश में उच्चतम शिक्षा व्यवस्था शैक्षणिक संस्थानों में संसाधन युक्त शिक्षा पाठ्यक्रमों को शुरू किए जायें।
इस संबंध में एमजीएसयू के चाणक्य परिसर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कुलपति प्रो संजय श्रीवास्तव ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि आगामी 28 फरवरी 2026 को मोतिहारी के महात्मा गांधी एडोटोरियम में शिक्षा समागम ( एजुकेशनल कॉन्क्लेव ) का आयोजन निर्धारित है।
जिसमें एआइ, मशीन लर्निंग, डिजिटल शिक्षा, उद्योग, नवाचार की चार सत्रों में। चर्चाएं होंगी। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से 25 कुलपतियों, शिक्षाविद और बड़े उद्योगपति व औद्योगिक संस्थानों के चेयरपर्सन शामिल होंगे।
बताया कि यह शिक्षा समागम का आयोजन केवल एक संवाद मात्र नहीं, बल्कि बिहार की उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों पर स्थापित करने और ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को धरातल पर उतारने की एक ऐतिहासिक पहल है।
इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के आलोक में उद्योग और अकादमिक जगत के बीच की खाई को पाटना और एक ऐसा परिणामोन्मुखी मंच तैयार करना है, जहाँ से बिहार की शैक्षणिक दशा और दिशा को नई ऊर्जा मिल सके।
बताया कि इसके उद्घाटन सत्र में देश के प्रख्यात नीति-निर्धारक और शिक्षाविद एक साथ मंच साझा करेंगे। कार्यक्रम में पूर्वी चंपारण के सांसद राधा मोहन सिंह, यूजीसी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रो. दीपक श्रीवास्तव, नालंदा विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सुनैना सिंह, और आईआईआईटी रांची के निदेशक प्रो. राजीव श्रीवास्तव जैसे दिग्गजों की उपस्थिति रहेगी।
साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान प्रो. बलराम सिंह भी भारतीय ज्ञान परंपरा पर अपने विचार साझा करेंगे। कुलपति ने जोर देकर कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय वर्तमान में बहुविषयक और कौशल-आधारित शिक्षा का ध्वजवाहक हैं।
जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का समावेश नहीं होगा और विद्यार्थी उद्योगों की तात्कालिक जरूरतों के अनुरूप कौशल नहीं सीखेंगे, तब तक हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को पूर्णता नहीं दे पाएंगे।
- चार सत्रों में होगी चर्चाएं
कुलपति ने बताया कॉन्क्लेव की संरचना अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक है, जिसे चार महत्वपूर्ण पैनल चर्चाओं में विभाजित किया गया है। प्रथम सत्र में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण और छात्र सहभागिता पर मंथन होगा, तो वहीं दूसरे विशेष सत्र में बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति राज्य की शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक सुधार और गुणवत्ता मानकों पर अपनी राय रखेंगे।
सबसे प्रतीक्षित सत्र ‘उद्योग से संवाद’ का होगा, जहाँ ऊर्जा, दूरसंचार और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ यह बताएंगे कि कैसे अकादमिक शोध को व्यावसायिक नवाचार में बदला जा सकता है। अंतिम तकनीकी सत्र भारतीय ज्ञान परंपरा के समकालीन उपयोग पर केंद्रित होगा, जो हमारे पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का काम करेगा।
समापन सत्र में भी प्रो. रामाशंकर दुबे और प्रो. शुक्ला महंती जैसे अनुभवी शिक्षाविदों का मार्गदर्शन प्राप्त होगा, जो पूरे दिन के विमर्श से निकले निष्कर्षों को भविष्य की कार्ययोजना में तब्दील करेंगे।
- बिहार बनेगा समावेशी शिक्षा का केंद्र : प्रो प्रसून दत्त
विश्वविद्यालय के मुख्य प्रॉक्टर प्रो. प्रसून दत्त सिंह और समन्वय समिति के अध्यक्ष प्रो. बृजेश पांडेय ने इस कॉन्क्लेव को नेतृत्वकारी पहल बताते हुए कहा कि यह आयोजन बिहार में प्रगतिशील, समावेशी और सतत विकास वाली शिक्षा व्यवस्था की नींव रखेगा।
प्रो प्रसून ने बताया कि इस शिक्षा समागम के साथ ही एमजीएसयू में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अनुरूप शैक्षिक व्यवस्था से बिहार समावेशी शिक्षा का केंद्र बनेगा। इस अवसर पर सदस्य सचिव प्रो. सपना सुगंधा और डॉ. श्याम नंदन सहाय ने भी इसे नवाचार की दिशा में एक दूरदर्शी कदम बताया।
विश्वविद्यालय ने समस्त शिक्षाविदों, शोधार्थियों, उद्योगपतियों और विद्यार्थियों को इस महाकुंभ का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है। निश्चित रूप से, 28 फरवरी को बापू की कर्मभूमि मोतिहारी से निकलने वाली ज्ञान की यह रश्मि न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की उच्च शिक्षा के लिए एक पथ-प्रदर्शक साबित होगी।
