Parliament Special Session : गिर गया महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल, पक्ष में पड़े 298 वोट

दिल्ली

सेंट्रल डेस्क। संसद के तीन दिवसीय विशेष के दौरान महिला आरक्षण 131वें संशोधन बिल को पास नहीं कराया जा सका. महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े तीन बिलों के ऊपर शुक्रवार की शाम को हुई वोटिंग में क्ष में सिर्फ 298 वोट ही पड़े. यानी 50 प्रतिशत आबादी की उम्मीद को बड़ा झटका लगा है.

बिल गिरने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि कुल वोट 528 पड़े, जिनमें से इसके पक्ष में 298 और ना में 230 वोट पड़े. पहले राउंड में कुल 489 वोट पड़े जिनमें पक्ष में 278 और खिला में 211 वोट पड़े. इस बिल को दो तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी. यानी जरूरत से 54 वोट कम पड़े.

इससे पहले, महिला आरक्षण विधेयक को लेकर लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी दलों से इस बिल का समर्थन करने की अपील की, तो वहीं विपक्ष ने इसे लेकर गंभीर आपत्तियां उठाईं. केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस सदन में 543 सांसद बैठते है.

किसी के संसदीय क्षेत्र में मतदाता की संख्या 49 लाख तो किसी के यहां 60 हज़ार है. कई सीटें इतनी बड़ी हो गई हैं कि सांसद उनसे मिल भी नहीं पाता है. मतदाताओं की अपेक्षा होती है, वो सांसद से मिलना चाहता है.

उन्होंने कहा कि क्या जो लोग विरोध कर रहे हैं, वो मुझे समझा सकता है कि जिनके यहां 49 लाख मतदाता हो, वो अपने ज़िम्मेदारी का निर्वाहन कैसे करता होगा ? इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान में समय समय पर परिसीमन का प्रावधान है.

इससे पहले, लोकसभा में बोलते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस बिल को “छलावा” करार दिया और कहा कि “यह बिल यहीं गिर जाएगा.” उन्होंने दावा किया कि यह वास्तव में महिलाओं के हित में लाया गया विधेयक नहीं है.

वहीं राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि 2023 में जो महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, उसी समय सत्ता पक्ष के सहयोगियों ने संकेत दिया था कि इसे लागू करने में लंबा समय लग सकता है. उनके मुताबिक, मौजूदा प्रस्ताव के जरिए असल मुद्दे से ध्यान हटाया जा रहा है.

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस बिल के बहाने भारत के चुनावी नक्शे (इलेक्टोरल मैप) को बदलने की कोशिश की जा रही है. राहुल गांधी का कहना था कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक गणित छिपा हुआ है, जिसे जनता के सामने लाना जरूरी है.

जबकि, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने ने महिला आरक्षण विधेयक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं है, लेकिन जिस तरीके से इस बिल को लागू करने की कोशिश की जा रही थी, वह स्वीकार्य नहीं है.

उन्होंने कहा कि पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन (Delimitation) करके महिला आरक्षण लागू करना गलत है, खासकर तब जब इसमें ओबीसी (OBC) वर्ग को शामिल नहीं किया गया. उनके मुताबिक, इस वजह से कांग्रेस इस बिल का समर्थन नहीं कर सकती थी. प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र और देश की एकता के लिए “बड़ी जीत” बताते हुए कहा कि यह विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ था.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह सिर्फ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसके जरिए राजनीतिक ढांचे में बदलाव की कोशिश की जा रही थी. उन्होंने यह भी कहा कि संसद के अंदर उन्होंने पहले ही इसे “संविधान पर हमला” बताया था, और अब इसके पास न होने को उन्होंने सकारात्मक परिणाम बताया. जहां सरकार इसे महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति और संरचनात्मक बदलाव के तौर पर देख रहा है.