मोतीहारी, राजन द्विवेदी। महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य’ पर आयोजित सप्तदिवसीय कार्यशाला में दूसरे दिन डॉ. श्याम नन्दन ने ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और कबीरदास’ विषय पर व्यख्यान देते हुए कहा – भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है।
इसकी आधारशिला भारतीय ज्ञान परम्परा है, जिसमें मानव जीवन के आध्यात्मिक, नैतिक,ता सामाजिक और दार्शनिक सभी आयामों का गहन चिंतन मिलता है। यह परम्परा केवल धार्मिक ग्रन्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है।
वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता जैसे ग्रन्थ भारतीय चिंतन की मूल धारा को प्रस्तुत करते हैं। इन ग्रन्थों में ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, धर्म, मोक्ष, मर्यादा, नैतिकता तथा समाज-व्यवस्था के सिद्धांतों का अत्यंत गहन विवेचन मिलता है।
मध्यकाल में कबीर दास ने इन्हीं सिद्धांतों को लोकभाषा में प्रस्तुत किया, जिससे भारतीय ज्ञान परम्परा जन-जन तक पहुँची। डॉ. श्याम नन्दन ने आगे कहा कि -‘भारतीय ज्ञान परम्परा मानव जीवन के संपूर्ण विकास का मार्ग प्रस्तुत करती है।
वेदों की आध्यात्मिकता, उपनिषदों का दर्शन, भगवद्गीता का कर्मयोग, रामायण की मर्यादा, महाभारत की नीति आदि सभी मिलकर भारतीय संस्कृति की महान धरोहर बनाते हैं। यह परम्परा हमें सिखाती है कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं है बल्कि आत्मिक उन्नति, नैतिकता, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति भी है।
आज आवश्यकता है कि हम इस महान ज्ञान परम्परा को समझें, अपनाएँ और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ। तभी भारत की सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रह सकेगी और मानव समाज का कल्याण होगा।
प्रो. शिरीष मिश्र ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत भाषा सभी भाषाओं में विशेष स्थान है। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और स्टॉक मार्केट के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा की उपयोगिता को रेखांकित किया तथा तकनीक और प्राचीन ग्रंथों के समन्वय की आवश्यकता बताई।
उन्होंने प्रतिभागियों को एआई के साथ-साथ मूल ग्रंथों के अध्ययन के लिए भी प्रेरित किया और कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व में अद्वितीय है। प्रो. बैद्यनाथ मिश्र ने भारतीय ज्ञान परम्परा में नक्षत्र विज्ञान और आयुर्वेद के महत्व को स्पष्ट किया।
उन्होंने आयुर्वेद में वर्णित तंत्र-युक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय शास्त्र लोककल्याण की भावना से परिपूर्ण हैं और हमारे ग्रंथों में वर्णित विद्या अत्यंत व्यापक है।
डॉ. उमेश पात्रा ने अपने वक्तव्य में समकालीन वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में विश्व विभिन्न संघर्षों से गुजर रहा है, जिसका प्रभाव सामान्य जनजीवन पर भी पड़ रहा है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रकृति, जीवन और संस्कृति के समन्वय को रेखांकित करते हुए इसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर विचार प्रस्तुत किए।
