संगठन का साथ नहीं मिला, फिर भी कप्तान ने पार लगाया ‘यूपी टी-20’ का जहाज!

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दो शहरों में पहली बार हाइब्रिड मॉडल पर लीग का सफल आयोजन

26 अगस्त के विवाद के बाद भी नहीं डिगे चेयरमैन संजय कपूर

लखनऊ/कानपुर, भूपेंद्र सिंह। यूपी क्रिकेट की तस्वीर में एक नया अध्याय जुड़ गया। प्रदेश के दो शहरों में पहली बार हाइब्रिड मॉडल पर यूपी टी-20 लीग का आयोजन कराकर उसे सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वह हैं लीग चेयरमैन संजय कपूर। खास बात यह रही कि जिस सफर में संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों से अपेक्षित सहयोग मिलना चाहिए था, उसी सफर में कई मौकों पर उन्हें अकेले मोर्चा संभालना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने कदम पीछे नहीं खींचे और लीग को उसके मुकाम तक पहुंचाकर ही दम लिया।

लीग के आयोजन को लेकर शुरुआत से ही चुनौतियां कम नहीं थीं। दो अलग-अलग शहरों में मैच कराना, व्यवस्थाओं को एक सूत्र में बांधना और पूरे आयोजन को सफल बनाना किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं था। इसके बावजूद संजय कपूर ने हाइब्रिड मॉडल को जमीन पर उतारकर यह साबित किया कि मजबूत इच्छाशक्ति हो तो मुश्किल प्रारूप को भी सफल बनाया जा सकता है।

26 अगस्त का विवाद बना सबसे बड़ा इम्तिहान
लीग के दौरान 26 अगस्त को संघ के सचिव के साथ विवाद ने हालात को और पेचीदा कर दिया। इसके बाद भी कपूर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि क्या संगठन के शीर्ष स्तर पर अपेक्षित तालमेल के बिना लीग की रफ्तार बरकरार रखी जा सकती है? कई मौकों पर शीर्ष अधिकारियों के बीच परस्पर सहयोग की कमी साफ दिखाई दी, लेकिन इसका असर लीग के संचालन पर पड़ने नहीं दिया गया।

जहां सामान्य परिस्थितियों में इस तरह का विवाद किसी आयोजन की व्यवस्था और मनोबल दोनों को प्रभावित कर सकता था, वहीं कपूर ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने टीम के साथ मैदान संभाले रखा और आयोजन की हर छोटी-बड़ी कड़ी को जोड़ने में जुटे रहे। विवाद के बाद पीछे हटने के बजाय लीग को सफल बनाने का संकल्प और मजबूत दिखाई दिया।

संगठन का असहयोग, चेयरमैन का संघर्ष
यूपी टी-20 की सफलता इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसे केवल क्रिकेट मैचों की श्रृंखला के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह प्रदेश में पहली बार दो शहरों को जोड़कर हाइब्रिड मॉडल पर आयोजित किया गया बड़ा क्रिकेट आयोजन था। ऐसे आयोजन में संगठन के सभी प्रमुख पदाधिकारियों का एकजुट होकर काम करना अपेक्षित होता है। लेकिन पर्दे के पीछे तालमेल की कमी और आपसी खींचतान के बीच लीग चेयरमैन ने अकेले अपने कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी उठाई।

आयोजन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते तस्वीर साफ हो गई विवाद और असहयोग के बावजूद लीग रुकी नहीं, बल्कि अपने सफल अंजाम तक पहुंची। सवाल अब यह है कि जब आयोजन सफल हुआ तो उसकी सफलता का श्रेय किसे मिले? निश्चित तौर पर इसमें खिलाड़ियों, टीमों, सपोर्ट स्टाफ और आयोजन से जुड़े हर व्यक्ति की भूमिका रही, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में लीग की कमान संभालकर उसे अंत तक पहुंचाने वाले कप्तान संजय कपूर की भूमिका सबसे अलग नजर आई। एक तरफ संगठन का अपेक्षित साथ नहीं, दूसरी तरफ चेयरमैन की जिद—और आखिरकार लीग सफल। यूपी टी-20 का यह संस्करण सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि मुश्किल हालात में नेतृत्व की परीक्षा और उसके परिणाम की कहानी भी बन गया।