नालंदा: संत शिरोमणि श्री श्री 108 बाबा मणिराम जी: नालंदा की गंगा-जमुनी तहज़ीब और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक

नालंदा

बिहारशरीफ, अविनाश पांडेय : विश्वविख्यात नालंदा की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान में संत शिरोमणि श्री श्री 108 बाबा मणिराम जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। शहर की भागदौड़ से दूर स्थित बाबा मणिराम का अखाड़ा वर्षों से आस्था, श्रद्धा और सांप्रदायिक सौहार्द का केंद्र बना हुआ है। यहां हर वर्ष लगने वाला गुरु पूर्णिमा मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी प्रस्तुत करता है।

लोकमान्यताओं के अनुसार बाबा मणिराम जी का जन्म उत्तर प्रदेश के हरिद्वार में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि के रूप में बिहारशरीफ को चुना। यहीं उन्होंने साधना, तपस्या और लोककल्याण के कार्यों से लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

बाबा मणिराम और मखदूम साहब की मित्रता की अनोखी कथा

बाबा मणिराम जी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा उनकी और सूफी संत शेख शरफुद्दीन याहिया मनेरी (मखदूम साहब) की मित्रता से जुड़ी है। कहा जाता है कि दोनों संतों में गहरा सम्मान और आत्मीय संबंध था, हालांकि कभी-कभी हंसी-मजाक और आध्यात्मिक नोकझोंक भी हो जाती थी।

मान्यता है कि एक दिन मखदूम साहब बाघ पर सवार होकर बाबा मणिराम से मिलने पहुंचे। उस समय बाबा मणिराम दीवार पर बैठकर दातून कर रहे थे। मखदूम साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “अपनी सवारी तैयार करो।” इस पर बाबा ने उत्तर दिया, “मैं जिस पर बैठ जाता हूं, वही मेरी सवारी बन जाती है।”

मखदूम साहब ने आश्चर्य से पूछा, “क्या यह दीवार भी तुम्हारी सवारी बन सकती है?” बाबा ने तत्काल दीवार से कहा, “चल-चल रे दीवार।” लोककथाओं के अनुसार, इतना कहते ही दीवार चलने लगी। यह दृश्य देखकर मखदूम साहब चकित रह गए और दोनों संतों की मित्रता और भी प्रगाढ़ हो गई। यह कथा आज भी नालंदा में हिंदू-मुस्लिम एकता और आध्यात्मिक समरसता के प्रतीक के रूप में सुनाई जाती है।

मल्लयुद्ध और रहस्यमयी पत्थर की परंपरा

बाबा मणिराम जी मल्लयुद्ध (कुश्ती) के बड़े प्रेमी माने जाते थे। आज भी उनके अखाड़े में कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित होती है और विजेता पहलवान को परंपरागत रूप से लंगोट भेंट किया जाता है।

अखाड़े में एक प्राचीन पत्थर भी स्थित है, जिसमें एक छोटा सा छिद्र है। स्थानीय मान्यता है कि बाबा की कृपा से उस छिद्र से भारी-भरकम व्यक्ति भी आसानी से निकल जाता है। यह पत्थर आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

चार शिष्यों के साथ ली थी समाधि

लोक परंपरा के अनुसार बाबा मणिराम जी ने अपने चार प्रमुख शिष्यों के साथ इसी स्थान पर समाधि ली थी। इनमें राणा प्रहलाद सिंह और वीरभद्र सिंह उत्तर प्रदेश के अयोध्या से थे, जबकि कुल्लड़ मोची और गुद्दी खलीफा बिहारशरीफ के निवासी थे। यह भी सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण माना जाता है कि बाबा के शिष्यों में विभिन्न सामाजिक वर्गों और समुदायों के लोग शामिल थे।

गुरु पूर्णिमा मेले की परंपरा

बाबा की समाधि पर पहले प्रत्येक वर्ष रामनवमी के अवसर पर लंगोट चढ़ाने की परंपरा थी। बाद में तत्कालीन उत्पाद निरीक्षक स्वर्गीय कपिल देव प्रसाद के प्रयास से 6 जुलाई 1952 (आषाढ़ गुरु पूर्णिमा) को इस मेले का विधिवत शुभारंभ हुआ। तभी से हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन होता है।

इस मेले में हजारों श्रद्धालु बाबा की समाधि पर लंगोट, प्रसाद और श्रद्धा अर्पित करते हैं। नालंदा जिला प्रशासन के अधिकारी भी अपने-अपने विभाग की ओर से सिर पर थाल में प्रसाद और लंगोट लेकर बाबा की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत प्रतीक

बाबा मणिराम का दरबार धार्मिक सद्भाव और सामाजिक एकता की अनूठी मिसाल माना जाता है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग समान श्रद्धा के साथ मत्था टेकते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर दोनों समुदायों के लोग बाजे-गाजे के साथ जुलूस निकालकर बाबा के दरबार पहुंचते हैं। इसी कारण बाबा मणिराम अखाड़ा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि नालंदा की गंगा-जमुनी संस्कृति, सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोगों के बीच आज भी एक कहावत प्रचलित है— “मणि बाबा दूर है, जाना जरूर है।”